हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत: राग, थाट और सितार का विस्तृत विश्लेषण
हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में रागों का ऐतिहासिक विकास
राग की अवधारणा भारतीय संगीत की आत्मा है। ‘राग’ शब्द संस्कृत की ‘रंज्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है ‘रंगना’ या ‘आनंदित करना’। जो रचना मनुष्य के चित्त को आनंद के रंग से रंग दे, वही राग कहलाती है।
प्राचीन काल (वैदिक से 13वीं शताब्दी)
- वैदिक काल: संगीत का प्राचीनतम उल्लेख सामवेद में मिलता है। इस काल में ग्राम और मूर्च्छना की अवधारणाएँ थीं, जो आधुनिक थाट और रागों की नींव थीं।
- भरत मुनि का नाट्यशास्त्र (ईसा पूर्व 200 से 200 ईस्वी): इसमें जाति गायन का वर्णन है, जिन्हें रागों का पूर्व रूप माना जाता है।
- मतंग मुनि की बृहद्देशी (5वीं-8वीं शताब्दी): यह पहला ग्रंथ है जहाँ ‘राग’ शब्द का स्पष्ट प्रयोग और परिभाषा दी गई है। उन्होंने देशी संगीत (जो लोक-मनोरंजन पर आधारित था) और मार्गी संगीत (जो धार्मिक और नियमबद्ध था) का भेद भी बताया।
मध्यकाल (13वीं से 18वीं शताब्दी)
- राग-रागिनी पद्धति: इस काल में रागों को पुरुष राग, रागिनी और पुत्र रागों में वर्गीकृत किया गया (जैसे, शिव मत, हनुमान मत)। यह वर्गीकरण संगीतमय से अधिक चित्रात्मक और भावनात्मक था, लेकिन वैज्ञानिक नहीं था।
- अमीर खुसरो: इन्होंने कई नए रागों (जैसे सहेली तोड़ी, पूर्वी) और शैलियों (ख्याल, कव्वाली) का आविष्कार करके संगीत को नया आयाम दिया।
- पंडित लोचन (राग तरंगिणी): इन्होंने रागों को मेल (थाट के समान) के अंतर्गत वर्गीकृत करने का प्रयास किया, जिससे आधुनिक थाट पद्धति की दिशा तय हुई।
आधुनिक काल (19वीं शताब्दी से वर्तमान)
- पं. विष्णु नारायण भातखंडे: इन्होंने वैज्ञानिक पद्धति से मध्यकाल की जटिल राग-रागिनी व्यवस्था को सरल बनाया। उन्होंने सभी प्रचलित रागों को 10 थाटों (बिलावल, कल्याण, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी, भैरवी) के अंतर्गत वर्गीकृत किया। आज हिंदुस्तानी संगीत में इसी थाट-राग वर्गीकरण पद्धति का पालन किया जाता है।
प्रमुख रागों का तकनीकी विवरण
पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने वाले कुछ प्रमुख रागों का विस्तृत विवरण निम्नलिखित है:
1. राग यमन (Raag Yaman)
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| थाट | कल्याण (Kalyan) |
| जाति | सम्पूर्ण-सम्पूर्ण (7 स्वर आरोह में, 7 अवरोह में) |
| स्वर | म तीव्र (M^a), बाकी सभी स्वर शुद्ध। |
| वादी | ग (गंधार) |
| संवादी | नि (निषाद) |
| गायन समय | रात्रि का प्रथम प्रहर (शाम 7 बजे से 10 बजे तक) |
| प्रकृति | शांत, गंभीर और भक्तिपूर्ण। यह कल्याण थाट का जनक राग है। |
| पकड़ | N_i R_e G_a – M^a D_h N_i – S_{a}’ |
| आरोह | S_a R_e G_a M^a P_a D_h N_i S_{a}’ |
| अवरोह | S_{a}’ N_i D_h P_a M^a G_a R_e S_a |
| विशेष | इसे इमन या कल्याण भी कहते हैं। तीव्र ‘म’ ही इसकी पहचान है। |
2. राग भैरव (Raag Bhairav)
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| थाट | भैरव (Bhairav) |
| जाति | सम्पूर्ण-सम्पूर्ण |
| स्वर | रे (कोमल) और ध (कोमल), बाकी स्वर शुद्ध। |
| वादी | ध (कोमल धैवत) |
| संवादी | रे (कोमल ऋषभ) |
| गायन समय | प्रातःकाल (सुबह 4 बजे से 7 बजे तक) – संधिप्रकाश राग |
| प्रकृति | गंभीर, भक्तिपूर्ण, शांत और मधुर। इसे “सुबह के रागों का राजा” कहते हैं। |
| पकड़ | G_a M_a D_h – P_a G_a M_a R_e S_a |
| आरोह | S_a R_e G_a M_a P_a D_h N_i S_{a}’ |
| अवरोह | S_{a}’ N_i D_h P_a M_a G_a R_e S_a |
| विशेष | यह राग अंग (शैली) प्रधान है, जिसमें मींड और आंदोलन का प्रयोग प्रमुख होता है। |
3. राग बिलावल (Raag Bilawal)
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| थाट | बिलावल (Bilawal) |
| जाति | सम्पूर्ण-सम्पूर्ण |
| स्वर | सभी स्वर शुद्ध। |
| वादी | ध (धैवत) |
| संवादी | ग (गंधार) |
| गायन समय | प्रातःकाल (सुबह 7 बजे से 10 बजे तक) |
| प्रकृति | आनंददायक, चंचल, गंभीर नहीं। यह हिंदुस्तानी संगीत का शुद्ध थाट माना जाता है। |
| पकड़ | G_a R_e G_a P_a – D_h N_i S_{a}’ |
| आरोह | S_a R_e G_a M_a P_a D_h N_i S_{a}’ |
| अवरोह | S_{a}’ N_i D_h P_a M_a G_a R_e S_a |
| विशेष | चूँकि इसके सभी स्वर शुद्ध हैं, इसलिए इसे ‘शुद्धांग’ राग भी कहा जाता है और इसका प्रयोग अक्सर बच्चों को संगीत सिखाने में होता है। |
4. राग काफी (Raag Kafi)
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| थाट | काफी (Kafi) |
| जाति | सम्पूर्ण-सम्पूर्ण |
| स्वर | ग (कोमल) और नि (कोमल), बाकी स्वर शुद्ध। |
| वादी | प (पंचम) |
| संवादी | रे (ऋषभ) |
| गायन समय | रात्रि का द्वितीय प्रहर (रात 10 बजे से 1 बजे तक) |
| प्रकृति | चंचल, श्रृंगार रस प्रधान। यह ठुमरी और होरी (फाग) के लिए बहुत प्रसिद्ध है। |
| पकड़ | S_a R_e P_a M_a G_a R_e S_a |
| आरोह | S_a R_e G_a M_a P_a D_h N_i S_{a}’ |
| अवरोह | S_{a}’ N_i D_h P_a M_a G_a R_e S_a |
| विशेष | यह एक परमेल प्रवेशक राग भी है, क्योंकि यह खमाज थाट के रागों के बाद और आसावरी के रागों से पहले गाया जाता है। |
रज़ाखानी गत की संरचना
रज़ाखानी गत द्रुत (Fast) या मध्य (Medium) लय में बजाया जाने वाला एक प्रकार का वाद्य-संगीत है, जो तीन ताल (Teen Taal – 16 मात्राएँ) में निबद्ध होता है।
1. राग यमन (Raag Yaman) में रज़ाखानी गत
राग यमन का यह गत तीन ताल में है, जो इसके वादी (ग) और संवादी (नि) स्वरों पर केंद्रित होगा।
- लय: मध्य/द्रुत (Medium/Fast)
- ताल: तीन ताल (16 मात्राएँ)
तीन ताल ठेका (राग यमन)
| मात्रा संख्या | 1 (सम) | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 (खाली) | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | 15 | 16 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ठेका | धा | धिन | धिन | धा | धा | धिन | धिन | धा | ना | धिन | धिन | धा | धा | धिन | धिन | धा |
| बोल (वाद्य) | X | (ताली 2) | O | ताली (3) | ताली (4) |
मुखड़ा (स्थायी – Mukhda/Sthayi)
यह मुखड़ा अक्सर S_a’ से शुरू होकर S_a पर सम पर आता है, या N_i से शुरू होकर S_a पर आता है।
| मात्रा | 1 (सम) | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 (खाली) | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | 15 | 16 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्वर | (S_a’) | N_i | D_h | P_a | M^a | G_a | R_e | S_a | (R_e G_a) | M^a | G_a | R_e | S_a | N_i | D_h | P_a |
| बोल | धि | र | धि | ट | कि | ट | धि | ट | धि | र | धि | ट | कि | ट | धि | ट |
(अर्थ: आलाप की समाप्ति पर S_a पर आ जाना।)
2. राग भूपाली (Raag Bhupali) में रज़ाखानी गत
राग भूपाली का यह गत भी तीन ताल में है, जो इसके वादी (ग) और संवादी (ध) स्वरों पर केंद्रित होगा। यह राग पंचम (P_a) और तार S_a’ के प्रयोग से भावपूर्ण बनता है।
- लय: मध्य/द्रुत (Medium/Fast)
- ताल: तीन ताल (16 मात्राएँ)
तीन ताल ठेका (राग भूपाली)
| मात्रा संख्या | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | 15 | 16 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ठेका | धा | धिन | धिन | धा | धा | धिन | धिन | धा | ना | धिन | धिन | धा | धा | धिन | धिन | धा |
| बोल (वाद्य) | X | (ताली 2) | O | ताली (3) | ताली (4) |
मुखड़ा (स्थायी – Mukhda/Sthayi)
यह मुखड़ा अक्सर मध्य सप्तक के P_a से शुरू होकर S_a पर सम पर आता है।
| मात्रा | 1 (सम) | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 (खाली) | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | 15 | 16 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्वर | (S_a) | R_e | G_a | R_e | S_a | D_h_1 | S_a | R_e | (G_a P_a) | D_h | P_a | G_a | R_e | S_a | D_h_1 | S_a |
| बोल | धि | र | धि | ट | कि | ट | धि | ट | धि | र | धि | ट | कि | ट | धि | ट |
(नोट: यहाँ D_h_1 मंद्र सप्तक का D_h है।)
नोटेशन समझने के लिए आवश्यक संकेत
- X (सम): प्रथम ताली/प्रथम मात्रा
- 2, 3, 4: अन्य तालियाँ
- O (खाली): खाली मात्रा
- S_a R_e G_a: शुद्ध स्वर
- M^a: तीव्र मध्यम
- D_h: कोमल स्वर (राग भैरव में) या शुद्ध स्वर (राग बिलावल, काफी, भूपाली में)। नोट: भूपाली में सभी स्वर शुद्ध होते हैं।
- S_a’: तार सप्तक का सा
- D_h_1: मंद्र सप्तक का धैवत
सितार: उद्गम और विकास
सितार के उद्गम को लेकर विद्वानों में मतभेद है, लेकिन सबसे मान्य सिद्धांत इसे वीणा और फ़ारसी वाद्य सेह-तार के संयोजन से विकसित मानता है।
1. वीणा से संबंध
- सितार को वीणा का एक सरल और विकसित रूप माना जाता है।
- सितार की संरचना में वीणा की तीन प्रमुख विशेषताएँ मिलती हैं: तंत्री (तार), घुड़च (पुल), तरब (अनुनादी तार), और सारिकाएँ (पर्दे)।
- सितार की उत्पत्ति से पहले भारत में एकतंत्री, त्रितंत्री, कच्छपी और कूर्मी जैसी कई प्रकार की वीणाएँ प्रचलित थीं। ऐसा माना जाता है कि सितार त्रितंत्री वीणा का ही एक विकसित रूप है।
2. अमीर खुसरो और सेह-तार
- लोकप्रिय मान्यता: कई संगीत विद्वान और जनमानस 13वीं शताब्दी के महान सूफी कवि और संगीतकार हज़रत अमीर खुसरो (1253-1325 ई.) को सितार का आविष्कारक मानते हैं। ऐसा कहा जाता है कि खुसरो ने भारतीय वीणा के जटिल स्वरूप को सरल बनाने और फ़ारसी वाद्य ‘सेह-तार’ (अर्थात तीन तार) के गुणों को मिलाकर सितार की रचना की। उन्होंने हिन्दुस्तानी और फ़ारसी रागों के संयोजन से नए राग भी ईजाद किए।
- आधुनिक शोध: आधुनिक इतिहासकार इस बात पर एकमत नहीं हैं कि 13वीं शताब्दी के अमीर खुसरो ने ही सितार का आविष्कार किया था। विद्वानों के अनुसार, ‘सितार’ नाम का सबसे पहला उल्लेख 1739 ई. के आस-पास मिलता है, जो मुग़ल दरबार के समय का है।
- 18वीं शताब्दी का खुसरो खान: कुछ विद्वान मानते हैं कि 18वीं शताब्दी में मुग़ल दरबार के एक व्यक्ति खुसरो खान (जिसे कुछ लोग 13वीं सदी के अमीर खुसरो का वंशज मानते हैं) ने ही फ़ारसी ‘सेह-तार’ को भारतीय वीणा के तत्वों के साथ मिलाकर आधुनिक सितार का प्रारंभिक रूप विकसित किया।
सितार का संरचनात्मक विकास
सितार का विकास 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में शुरू हुआ और विभिन्न संगीतकारों द्वारा किए गए तकनीकी सुधारों के कारण इसे इसका आधुनिक रूप मिला।
प्रारंभिक चरण (18वीं शताब्दी)
- तारों की संख्या: प्रारंभिक सितार में संभवतः केवल तीन या चार मुख्य तार थे।
- गतों का आविष्कार: मोहम्मद शाह रंगीले के दरबारी गायक नेमत खाँ (सदारंग) को सितार पर बजाने योग्य गतों (मसीतखानी गत) का प्रथम रचनाकार माना जाता है। उनके पुत्र/भतीजे फ़िरोज़ खाँ ने फ़िरोज़खानी गतों की रचना की। इन रचनाओं ने सितार को गायन की संगत करने वाले वाद्य से हटाकर स्वतंत्र वादन के वाद्य के रूप में स्थापित किया।
महत्वपूर्ण संरचनात्मक सुधार
| काल | सुधारक | योगदान |
|---|---|---|
| 18वीं शताब्दी | अमृत सेन (जयपुर) | उन्होंने सितार में तीन अतिरिक्त तार जोड़कर तारों की संख्या छह कर दी। बाद में एक सातवाँ तार (चिकारी) भी जोड़ा गया। |
| 18वीं शताब्दी | मसीत खान | उन्होंने सितार में दो और तार जोड़े, जिससे तारें सात हो गईं और मसीतखानी गत शैली का प्रचलन किया। |
| आधुनिक काल | इमदाद खान | उन्होंने तरब के तार (Sympathetic Strings) जोड़े, जो सितार की ध्वनि को गूंज और गहराई देते हैं। |
| आधुनिक काल | उस्ताद विलायत खान | इन्होंने तारों के ट्यूनिंग और वादन शैली (गायन शैली) में महत्वपूर्ण बदलाव किए। |
| आधुनिक काल | उस्ताद अलाउद्दीन खान | उन्होंने आधुनिक सात-तार वाले सितार को अंतिम रूप दिया। |
वादन शैली का विकास (घरानों का योगदान)
सितार वादन के विभिन्न घरानों ने इसकी शैली को समृद्ध किया:
- सेनिया घराना: इस घराने को तानसेन के वंशजों से उत्पन्न माना जाता है और इसकी छाप लगभग सभी आधुनिक सितार घरानों पर है।
- इमदादखानी / इटावा घराना: इस घराने ने “गायन शैली” को सितार पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने की पद्धति विकसित की।
वर्तमान में, सितार को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में एक प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त है, और यह दुनिया भर में भारतीय संस्कृति का प्रतीक बन चुका है।
(आप सितार के अंगों और उसकी संरचना के बारे में और जान सकते हैं Introduction of Sitar सितार का परिचय नामक वीडियो में।)
तार वाद्यों का महत्व
तार वाद्य (String Instruments) संगीत में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं क्योंकि ये सुर, राग और भावनाओं को बहुत असरदार तरीके से व्यक्त करने में मदद करते हैं। इनका प्रयोग शास्त्रीय से लेकर फिल्मी और लोक संगीत तक हर जगह होता है।
तार वाद्यों की मुख्य भूमिका
तार वाद्यों से निकलने वाली ध्वनि बहुत मधुर, लचीली और भावपूर्ण होती है, इसलिए इन्हें गाने के साथ संगत और अकेले (Solo) वादन दोनों के लिए उपयोग किया जाता है। ये वाद्य रागों की सूक्ष्मता, मींड, गमक और आलाप जैसी खासियतों को साफ़-साफ़ दिखाने में सक्षम होते हैं।
भारतीय संगीत में महत्व
भारतीय शास्त्रीय संगीत में सितार, सरोद, वीणा, तानपुरा, सारंगी, वायलिन आदि तार वाद्य रागों की प्रस्तुति का मुख्य आधार माने जाते हैं। तानपुरा जैसे तंत्री वाद्य लगातार पृष्ठभूमि में स्वर-साधना (Drone) देकर गायक या वादक को सही सुर पर टिकने में सहायता करते हैं।
भावना और अभिव्यक्ति
तार वाद्य बजाने वाला कलाकार उंगलियों के दबाव, गति और तकनीक बदलकर ध्वनि को कभी कोमल, कभी तेज, कभी दुखी, तो कभी आनंदमय बना सकता है। इस वजह से फिल्मों, भजन, गज़ल और रोमांटिक गीतों में भी तार वाद्यों का बहुत प्रयोग होता है, क्योंकि ये सीधे श्रोता की भावनाओं को छूते हैं।
समूह संगीत और ऑर्केस्ट्रा में
पश्चिमी संगीत में वायलिन, वायोला, सेलो, डबल-बेस जैसे तार वाद्य पूरे ऑर्केस्ट्रा की रीढ़ माने जाते हैं और इनसे मेलोडी भी बनती है और पृष्ठभूमि की हार्मनी भी। भारतीय फिल्म संगीत के ऑर्केस्ट्रेशन में भी तार वाद्यों की परतें गाने को भरपूर और समृद्ध बना देती हैं।
शिक्षा और अभ्यास में महत्व
तार वाद्य सीखने से सुर की समझ, लय की पकड़, ध्यान-एकाग्रता और अनुशासन विकसित होता है, जो संगीत के साथ-साथ अन्य पढ़ाई और व्यक्तित्व विकास में भी मदद करता है। विद्यार्थी जब ऐसे वाद्य सीखते हैं तो उनमें रचनात्मकता, धैर्य और आत्मविश्वास भी बढ़ता है।
