भारतीय राजनीति पर सामाजिक कारकों का प्रभाव और दबाव समूह
भारतीय राजनीति पर सामाजिक कारकों का प्रभाव
भारतीय राजनीति पर सामाजिक कारकों का गहरा और व्यापक प्रभाव रहा है। भारत एक बहु-सांस्कृतिक, बहु-धार्मिक और बहु-जातीय समाज है, जहाँ सामाजिक संरचना सीधे राजनीतिक व्यवहार, नीतियों और सत्ता वितरण को प्रभावित करती है। सामाजिक कारक न केवल चुनावी राजनीति को दिशा देते हैं, बल्कि राजनीतिक दलों की विचारधाराओं और सरकारी नीतियों के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
भारतीय राजनीति को प्रभावित करने वाले प्रमुख सामाजिक कारक
- 1. जाति (Caste): जाति भारतीय राजनीति का सबसे प्रभावशाली सामाजिक कारक है। चुनावों में जातिगत समीकरण महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। राजनीतिक दल उम्मीदवार चयन और गठबंधन बनाते समय जाति को ध्यान में रखते हैं। पिछड़े वर्गों और दलितों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलने से सामाजिक न्याय की राजनीति को बढ़ावा मिला है।
- 2. धर्म (Religion): धर्म ने भारतीय राजनीति को गहराई से प्रभावित किया है। धार्मिक पहचान के आधार पर वोट बैंक की राजनीति विकसित हुई है। कई राजनीतिक दल धार्मिक भावनाओं का उपयोग जनसमर्थन प्राप्त करने के लिए करते हैं, जिससे कभी-कभी सांप्रदायिक तनाव भी उत्पन्न होता है।
- 3. क्षेत्रवाद (Regionalism): क्षेत्रीय असमानताओं और स्थानीय पहचान ने क्षेत्रीय राजनीति को जन्म दिया है। राज्यों में क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ है, जिन्होंने केंद्र की राजनीति को भी प्रभावित किया है। क्षेत्रवाद ने संघीय ढांचे को मजबूत किया, लेकिन अलगाववादी प्रवृत्तियाँ भी उभरीं।
- 4. भाषा (Language): भाषा ने राज्यों के पुनर्गठन और क्षेत्रीय पहचान के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भाषायी आधार पर राजनीति ने केंद्र-राज्य संबंधों को प्रभावित किया और क्षेत्रीय दलों को मजबूती प्रदान की।
- 5. वर्ग एवं आर्थिक स्थिति (Class & Economic Status): समाज में अमीर-गरीब का अंतर राजनीतिक नीतियों को प्रभावित करता है। गरीबी उन्मूलन, आरक्षण, रोजगार और कल्याणकारी योजनाएँ इसी कारक का परिणाम हैं। राजनीतिक दल विभिन्न वर्गों को आकर्षित करने के लिए आर्थिक वादे करते हैं।
- 6. शिक्षा एवं जागरूकता (Education & Awareness): शिक्षा के स्तर में वृद्धि से राजनीतिक जागरूकता बढ़ी है। शिक्षित वर्ग सरकार से पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और सुशासन की माँग करता है, जिससे राजनीति अधिक मुद्दा-आधारित बन रही है।
- 7. सामाजिक आंदोलन और दबाव समूह: किसान आंदोलन, महिला आंदोलन, दलित आंदोलन जैसे सामाजिक आंदोलनों ने राजनीति को प्रभावित किया है। इन आंदोलनों ने नीतियों में बदलाव और नए कानूनों के निर्माण में योगदान दिया है।
राजनीतिक व्यवस्था पर सामाजिक कारकों का प्रभाव
- चुनावी राजनीति में पहचान आधारित मतदान को बढ़ावा।
- राजनीतिक दलों की नीतियों और घोषणापत्रों पर प्रभाव।
- सामाजिक न्याय और समावेशी राजनीति को बल।
- कभी-कभी विभाजनकारी राजनीति और तनाव की स्थिति।
भारतीय राजनीति में दबाव समूह
दबाव समूह (Pressure Groups) भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण तत्व हैं। ये ऐसे संगठित समूह होते हैं जो अपने विशेष हितों की पूर्ति के लिए सरकार और प्रशासन की नीतियों तथा निर्णयों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। दबाव समूह सत्ता प्राप्त करने के लिए चुनाव नहीं लड़ते, बल्कि राजनीतिक व्यवस्था के भीतर रहकर दबाव बनाते हैं। लोकतांत्रिक प्रणाली में ये समूह जनता और सरकार के बीच सेतु का कार्य करते हैं।
दबाव समूहों की प्रमुख विशेषताएँ
- ये राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने का लक्ष्य नहीं रखते।
- ये किसी विशेष वर्ग, समुदाय या पेशे के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- ये संगठित, उद्देश्य-प्रधान और निरंतर सक्रिय रहते हैं।
- ये सरकार पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार से प्रभाव डालते हैं।
भारतीय राजनीति में दबाव समूहों के प्रकार
- व्यावसायिक एवं औद्योगिक समूह: ये उद्योगपतियों और व्यापारियों से जुड़े संगठन होते हैं जो आर्थिक नीतियों, कर प्रणाली और औद्योगिक विकास से संबंधित निर्णयों को प्रभावित करते हैं।
- कृषक संगठन: किसानों के हितों की रक्षा के लिए गठित ये संगठन न्यूनतम समर्थन मूल्य, ऋण माफी और कृषि नीतियों पर सरकार पर दबाव बनाते हैं।
- श्रमिक संघ: श्रमिक संघ मजदूरों के अधिकारों, वेतन, कार्य-स्थितियों और सामाजिक सुरक्षा के लिए संघर्ष करते हैं।
- धार्मिक एवं जातीय समूह: ये समूह धर्म और जाति के आधार पर अपने हितों की माँग करते हैं और राजनीतिक दलों को प्रभावित करते हैं।
- छात्र, शिक्षक एवं अन्य पेशेवर संगठन: ये संगठन शिक्षा नीति, रोजगार और प्रशासनिक सुधारों से जुड़े मुद्दों पर प्रभाव डालते हैं।
दबाव समूहों की कार्यप्रणाली
दबाव समूह ज्ञापन देना, धरना-प्रदर्शन करना, हड़ताल, जनमत निर्माण, मीडिया का उपयोग तथा राजनीतिक दलों और नेताओं पर प्रभाव डालने जैसे तरीकों से कार्य करते हैं। कई बार ये नीति निर्माण प्रक्रिया में सुझाव देकर सरकार को निर्णय लेने में सहायता भी करते हैं।
दबाव समूहों की भूमिका एवं महत्व
- नीतियों और कानूनों के निर्माण में प्रभाव।
- जनता की समस्याओं को सरकार तक पहुँचाना।
- लोकतंत्र को अधिक सहभागी और उत्तरदायी बनाना।
- सामाजिक और आर्थिक मुद्दों को उजागर करना।
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